रायपुर

हाईकोर्ट ने दिया मुकदमा चलाने का आदेश…14 साल बाद बालकों हादसे में मृतकों के परिजनों को मिलेगा इंसाफ ?

बिलासपुर। मशहूर उद्योगपति अनिल अग्रवाल की वेदांता लिमिटेड समूह की प्रमुख कंपनी भारत एल्युमिनियम कंपनी लिमिटेड बालको (BALCO) की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। मामला 14 वर्ष पहले के कोरबा में हुई भयानक बालको चिमनी दुर्घटना से संबंधित है।

ताजा घटनाक्रम के अनुसार, बिलासपुर हाईकोर्ट द्वारा बालको में 14 साल पहले की चिमनी गिरने की घातक घटना में सेपको कंपनी के तीन चीनी अधिकारियों समेत पांच व्यक्तियों पर मुकदमा नहीं चालने की मांग को खारिज कर दिया गया है। इन कंपनी कमर्चारियों ने कोरबा जिला अदालत में लगे आरोपों के खिलाफ रिवीजन याचिका हाईकोर्ट में दाखिल की थी। हाईकोर्ट ने जिला अदालत को सेपको के अधिकारियों के खिलाफ मामले की सुनवाई पूरी करने के निर्देश दिए हैं।

मुकादमा चलाने का आदेश –

बिलासपुर हाईकोर्ट द्वारा सेपको के जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ जिला कोर्ट में मामला चलाने का भी आदेश दिया गया है। कोर्ट द्वारा 304 और 201 के तहत आरोप निर्धारित किए गए हैं, जिसमें आरोपियों पर जानबूझकर जान जोखिम वाले काम करने और साक्ष्य छिपाने के आरोप कोर्ट द्वारा तय किए गए हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार, एडीजे कोर्ट द्वारा धारा 304 और 201 के अंतर्गत आरोप निर्धारित किया है, पुलिस चालान प्रस्तुत कर चुकी है।

अधिकारियों की गिरफ्तारियाँ –

पुलिस द्वारा प्रारंभिक जाँच के बाद बालको, जीडीसीएल, सेपको के जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ अपराध दर्ज कर उनको गिरफ्तार किया था। इसके बाद एडीजे कोर्ट द्वारा 13 दोषियों के खिलाफ आरोप तय किए थे। इसमें चीनी ठेका कंपनी सेपको के प्रोजेक्ट मैनेजर वू छनान, ल्यू जाकसन, वांग क्यूंग शामिल हैं।

बालको द्वारा अपनी वार्षिक रिपोर्ट 2022-23 में चिमनी हादसे की जाँच आदि की कोई जानकारी या घटना क्रम के ताजा हालतों की प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की गई है।

साक्ष्य छुपाने का आरोप –

भारत की सबसे बड़ी औद्योगिक दुर्घटनाओं में से एक इस भयावह घटना में शामिल कंपनियों के अधिकारियों पर अपराध के साक्ष्य को छिपाने का आरोप है।

क्या है धारा 304 –

भारतीय दण्ड विधान की धारा 304, गैर इरादतन हत्या के लिए सजा का प्रावधान करती है। इस धारा के तहत, किसी व्यक्ति को उस अपराध के लिए दोषी ठहराया जा सकता है, जिसके परिणामस्वरूप किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, और उस व्यक्ति को यह पता नहीं था कि उसके कार्य से मृत्यु हो सकती है।

क्या है धारा 201 –

भारतीय दण्ड विधान की धारा 201, अपराध के साक्ष्य को गायब करने या अपराधी को छिपाने के लिए झूठी सूचना देने के अपराध के लिए सजा का प्रावधान करती है। इस धारा के तहत, किसी व्यक्ति को उस अपराध के लिए दोषी ठहराया जा सकता है, जिसमें वह जानबूझकर किसी अपराध के सबूत को नष्ट, छिपाता या बदलता है, या किसी अपराधी को छिपाने के लिए झूठी सूचना देता है।

शासन की ओर से डिप्टी एडवोकेट जनरल मधुनिशा सिंह ने हाईकोर्ट में पक्ष रखा –

कंपनी ने इस घटना से संबंधित घटनाक्रम, स्थानीय प्रशासन, पुलिस प्रशासन और न्याय व्यवस्था को इतने अच्छे ढंग से मैनेज किया है कि कंपनी के किसी भी निदेशक या वरिष्ठ अधिकारी का नाम इस घटना के लिए जिम्मेदार लोगों में नहीं आया और इतना ही नहीं घटना के प्रकरण को 14 वर्ष तक लटकाए रखने में कामयामी हासिल कर ली।

धटना क्रम –

कोर्ट में प्रस्तुत चालान के अनुसार, बालको सहित चीनी ठेका कंपनी सेपको, उप ठेका कंपनी जीडीसीएल और एनसीसीबीएम के अधिकारियों पर भारतीय दण्ड विधान की धारा 304 – जानबूझकर ऐसा कृत्य करना, जिसमें किसी की मृत्यु हो सकती हो और धारा 201 – साक्ष्य छुपाने का आरोप लगाया गया था। इस पर आरोपियों ने धारा 304 को 304 ए – गैर इरादतन हत्या में बदलने के लिए याचिका दाखिल की थी। एडीजे कोर्ट ने आरोपियों के आवेदन को नामंजूर करते हुए सभी के खिलाफ धारा 304 और 201 के अंतर्गत आरोप निर्धारित किए थे। एडीजे कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की गई थी।

इन पर दर्ज किए गए हैं प्रकरण –

मामले में बालको के तात्कालीन प्रोजेक्ट मैनेजर विरल मेहता, अतिरिक्त महाप्रबंधक दीपक नारंग, जीटीई अतुल महापात्रा, चीनी ठेका कंपनी सेपको के प्रोजेक्ट मैनेजर वू छनान, ल्यू जाकसन, वांग क्यूंग, उप ठेका कंपनी जीडीसीएल के प्रोजेक्ट मैनेजर मनोज शर्मा, इंजीनियर आलोक शर्मा, सुनील सिंह, विशक्ति पाल, व्यंकटेश, संजय देव, अनिरुद्ध और विकास भारती के खिलाफ आरोप तय किए हैं।

इसके अलावा कोर्ट ने हादसे के बाद निर्माण सामग्री की गुणवत्ता की जांच करने वाले नेशनल काउंसिल फार सीमेंट एंड बिल्डिंग मटेरियल्स – एनसीसीबीएम वल्ल्भगढ़ के संयुक्त संचालक डा. एम.एन. अंसारी, समूह प्रबंधक यूके मंडल और महाप्रबंधक आके गोस्वामी को भी आरोपी बनाया है। इन पर साक्ष्य छुपाने और उनसे छेड़छाड़ करने का आरोप है। इसमें गोस्वामी की मृत्यु हो चुकी है।

सालभर के भीतर होगी सुनवाई –

बिलासपुर हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की सिंगल बेंच ने याचिकाएँ खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट को सालभर के भीतर सुनवाई पूरी करने के लिए कहा है।

बालको चिमनी हादसाः भयावह औद्योगिक दुर्घटना –

बालको चिमनी हादसा भयावह औद्योगिक दुर्घटना है जो 23 सितंबर 2009 को छत्तीसगढ़ के कोरबा में हुई थी। 1200 मेगावाट की बिजली संयंत्र परियोजना में निर्माण में लगी 248 मीटर ऊंची चिमनी गिर गई थी। इस हादसे में, भारत एल्युमिनियम कंपनी (BALCO) के कारखाने की चिमनी गिर गई, जिससे 40 से अधिक ठेका मजदूरों की मौत हो गई थी।

कब हुई थी घटना –

बालको चिमनी हादसे का वह भयानक मंजर याद कर आज भी रूह कांप जाती है। 3 सितंबर 2009 को बारिश के मौसम के समय यह जानलेवा घटना घटी थी।

कितनी ऊँची थी चिमनी –

बाल्को और वेदान्ता लिमिटेड के दस्तावेज के अनुसार, 248 मीटर ऊँची थी।

कितने लोग मारे गए थे –

वेदान्ता लिमिटेड ने अपने 2010 की वाषिक रिपोर्ट में 40 ठेका कर्मचारियों के मारे जाने की जानकारी दी थी।

इन्हें बनाया गया था आरोपी –

गुंजन गुप्ता, डायरेक्टर,
विरल मेहता प्रोजेक्ट इंचार्ज
हाउ जूओजीन चेयरमेन, सेपको
सचित बरन सरकार डायरेक्टर, जीडीसीएल
नारायण दास सराफ डायरेक्टर, जीडीसीएल
अशोक चंद बर्मन डायरेक्टर, जीडीसीएल
पराग चंदूलाल मेहता डायरेक्टर, जीडीसीएल
कमल महावीर प्रसाद डायरेक्टर, जीडीसीएल
वू छूनान प्रोजेक्ट मैनेजर, सेपको
मनोज शर्मा प्रोजेक्ट मैनेजर, जीडीसीएल

बालको क्या है –

भारत एल्युमिनियम कंपनी (BALCO) भारत सरकार के स्वामित्व वाली एल्युमीनियम उत्पादक कंपनी है। इसे 1965 में एक केंद्र सरकारी क्षेत्र के रूप में शामिल किया गया था। भारत एल्युमिनियम कंपनी लिमिटेड (BALCO) भारत की एक प्रमुख एल्युमिनियम उत्पादक कंपनी है। यह कंपनी 1965 में भारत सरकार के खान मंत्रालय के तहत एक सार्वजनिक क्षेत्र की इकाई के रूप में स्थापित की गई थी। 2001 में, इसे वेदांता रिसोर्सेज को बेच दिया गया था। BALCO का मुख्यालय कोरबा, छत्तीसगढ़ में है।

1965 में स्थापित, बाल्को विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त प्राकृतिक संसाधन समूह, वेदांता लिमिटेड की एक प्रमुख कंपनी के रूप में उभरी है।

बालको वतर्मान चेयरमैन कौन है –

वर्तमान में सुशील कुमार रूंगटा (एसके रूंगटा) बालको के चेयरमैन हैं जो कि कंपनी एक इंडीपेन्टेंड डायरेक्टर हैं। सुशील कुमार रूंगटा 31 जनवरी 2012 से कंपनी के बोर्ड सदस्य रह हैं , और 17 अक्टूबर 2014 से अध्यक्ष का पद संभाला है।

बालको के वतर्मान सीईओ कौन है –

16 सितंबर 2023 तक, बालको के वर्तमान सीईओ राजेश कुमार हैं। वह 1 फरवरी 2023 को इस पद पर नियुक्त हुए थे। इससे पहले, वह बालको के एमडी (मेन्युफैक्चरिंग) थे।

बालको चिमनी हादसा में चेयरमेन का समंस निरस्त –

आपको बता दें कि सात वर्ष पहले, सेपको इलेक्ट्रिक पावर कंस्ट्रक्शन कार्पोरेशन के चेयरमैन को जारी किया गया समंस हाईकोर्ट द्वारा प्रकरण की सुनवाई के बाद निरस्तर कर दिया गया था। चिमनी हादसे के बाद निर्माण कंपनी के चेयरमैन हाऊ जोजिन को फैक्ट्री एक्ट की धारा 92 के तहत आरोपी बनाते हुए समंस जारी किया गया था। जारी समंस में चेयरमैन पर आरोप लगाया गया था कि निर्माण के दौरान चिमनी का उचित रख-रखाव नहीं होने और निर्माण कंपनी के चेयरमैन होने के बाद भी चिमनी हादसे की कोई जानकारी नहीं दी। याचिका में कहा गया था कि हादसे की जवाबदारी चेयरमैन पर नहीं बनती। हाईकोर्ट ने प्रकरण की सुनवाई के बाद चेयरमैन को जारी समंस निरस्त कर दिया था।

क्या कहती है जस्टिस संदीप बख्शी की रिपोर्ट –

सात वर्ष पहले, मामले में श्रम न्यायालय ने दोषी पाते हुए बालको के पूर्व सीईओ और डायरेक्टर गुंजन गुप्ता के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया था। एकल सदस्यीय न्यायिक जांच आयोग ने माना कि जांच में उदासीनता और लापरवाही बरती गई है। जस्टिस संदीप बख्शी ने इसकी सुनवाई पूरी कर जो रिपोर्ट शासन को दी थी। उसमें उल्लेख किया गया था कि परियोजना में चिमनी निर्माण के पूर्व संरचना, गुणवत्ता व सुरक्षा से संबंधी बनाए गए कानूनों का पालन नहीं किया गया। निर्माण गतिविधियों के दौरान मजदूर व अन्य व्यक्तियों की सुरक्षा एवं बचाव नियम एवं व्यवस्था की अनदेखी की गई। इसके लिए बालको, सेपको, जीडीसीएल उत्तरदायी है। इसके अलावा नगर पालिक निगम, नगर एवं ग्राम निवेश विभाग व श्रम विभाग के तत्कालीन संबंधित अधिकारियों की लापरवाही व उदासीनता भी उजागर हुई थी।

लिपापोती व कुशल प्रबंधन का शानदार उदाहरण –

क्या कमाल की प्रबंधन क्षमता है कंपनियों में! दिल दहला देने वाली दुर्घटना के बावजूद, साझा रूप में कंपनियों, स्थानीय प्रशासन, पुलिस प्रशासन, और न्यायिक व्यवस्था ऐसी सांठगांठ रही की कि कंपनी के किसी भी निदेशक या वरिष्ठ अधिकारी का नाम घटना के ‘मुख्य अभिनेता’ में शामिल ही नहीं हुआ। और जैसे कि यह कम बात थी, कंपनियों द्वारा प्रकरण को ठंडे बस्ते में डालकर, एक धीमी गति से चलती हुई घड़ी की तरह 14 वर्ष तक टालए हुए रखने में महारत हासिल कर ली गई! शायद सोचा गया होगा कि वक्त के साथ लोग, प्रशासन और तंत्र सब कुछ भूल जाते है। घटना की जांच रिपोर्ट अभी तक सार्वजनिक नहीं की गई है। वाह, क्या अद्वितीय प्रशासनिक और कुशल जनसम्पर्क प्रबंधन है! इस ‘कला’ के लिए उसबको सलामी देनी चाहिए।

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